Kohlberg Moral Development Theory-कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत
(CTET / CDP) परीक्षा की दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि बच्चों की नैतिक सोच धीरे-धीरे विकसित होती है और यह विकास तीन क्रमिक स्तरों तथा छह निश्चित चरणों में आगे बढ़ता है। प्रारंभिक अवस्था में बच्चा सही-गलत का निर्णय केवल दंड से बचने या अपने लाभ के आधार पर करता है, जबकि आगे चलकर वही बच्चा समाज, कानून, न्याय और अंततः सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर निर्णय लेने लगता है।

यह सिद्धांत यह समझाने में सहायक है कि बच्चे नैतिक निर्णय कैसे लेते हैं और उनकी तर्क-प्रणाली उम्र तथा अनुभव के साथ किस प्रकार परिपक्व होती जाती है। कोहलबर्ग ने इस नैतिक तर्क को स्पष्ट करने के लिए ‘हाइन्स दुविधा (Heinz Dilemma)’ जैसे उदाहरणों का प्रयोग किया, जिनके माध्यम से यह जाना जाता है कि व्यक्ति किसी नैतिक समस्या को किस स्तर पर सोचकर हल करता है।
Kohlberg Moral Development Theory-जानिए बच्चे सही-गलत का निर्णय कैसे करना सीखते हैं – CTET CDP के लिए सरल व्याख्या
🌟 संक्षिप्त परिचय
क्या कोई बच्चा इसलिए सच बोलता है क्योंकि उसे सज़ा का डर है,
या इसलिए क्योंकि वह न्याय और नैतिकता को समझने लगा है?
इसी प्रश्न का वैज्ञानिक उत्तर खोजने का प्रयास किया था
लॉरेंस कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg) ने अपने प्रसिद्ध
नैतिक विकास सिद्धांत (Theory of Moral Development) के माध्यम से।
यह सिद्धांत बताता है कि बच्चों में सही और गलत की समझ
उम्र के साथ-साथ सोचने की प्रक्रिया और अनुभवों के आधार पर कैसे विकसित होती है।
इसी कारण CTET / CDP परीक्षा में कोहलबर्ग के सिद्धांत से जुड़े प्रश्न
शिक्षक अभ्यर्थियों की मनोवैज्ञानिक समझ और कक्षा-स्तरीय व्यवहार को परखने के लिए पूछे जाते हैं।
Kohlberg Moral Development Theory-कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत (Kohlberg’s Theory of Moral Development) मनोविज्ञान के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि बच्चे और वयस्क सही और गलत के बीच अंतर कैसे करना सीखते हैं।
Kohlberg Moral Development Theory-नैतिकता का विकास: लॉरेंस कोहलबर्ग का सिद्धांत (Kohlberg’s Theory)
क्या आपने कभी सोचा है कि हम “सही” और “गलत” का फैसला कैसे करते हैं? क्या हमारा फैसला सजा के डर से होता है, या समाज के नियमों की वजह से, या फिर हमारे अपने सिद्धांतों के कारण? अमेरिकी मनोवैज्ञानिक लॉरेंस कोहलबर्ग ने इन्ही सवालों का जवाब ढूंढने के लिए एक सिद्धांत दिया, जिसे ‘नैतिक विकास का सिद्धांत’ कहा जाता है।
Kohlberg Moral Development Theory या कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत बच्चों और व्यक्तियों में नैतिक सोच के विकास को समझाने वाला एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सिद्धांत है। यह सिद्धांत बताता है कि व्यक्ति सही और गलत का निर्णय कैसे करता है और नैतिकता का विकास उम्र तथा अनुभव के साथ किस प्रकार होता है। CTET, State TET और CDP परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे हर वर्ष 2–3 प्रश्न अवश्य पूछे जाते हैं। इस लेख में आप Kohlberg Moral Development Theory in Hindi को सरल भाषा, उदाहरणों और stages के साथ विस्तार से समझेंगे।
पियाजे के विचारों से प्रेरित होकर लॉरेंस कोह्लबर्ग ने यह निष्कर्ष निकाला कि नैतिक विकास किसी एक समय में नहीं होता, बल्कि यह क्रमबद्ध चरणों के माध्यम से आगे बढ़ता है। उन्होंने अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों से नैतिक परिस्थितियों से जुड़े प्रश्न पूछे और उनके उत्तरों का विश्लेषण किया। इस अध्ययन से उन्हें यह समझने में सहायता मिली कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ व्यक्ति की नैतिक सोच और तर्क करने की क्षमता में किस प्रकार परिवर्तन आता है।
नैतिकता का अर्थ है सही और गलत के बीच स्पष्ट भेद करने की क्षमता। नैतिकता को समाज की एक आवश्यक आधारशिला माना जाता है, क्योंकि इसके बिना एक व्यवस्थित और सभ्य समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। कोह्लबर्ग के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी परिस्थिति में यह तय करता है कि कौन-सा व्यवहार उचित है और कौन-सा अनुचित, तो इस निर्णय के पीछे जो मानसिक प्रक्रिया कार्य करती है, उसे नैतिक तर्कणा (Moral Reasoning) कहा जाता है।
जब किसी स्थिति में व्यक्ति यह निर्णय नहीं कर पाता कि क्या सही है और क्या गलत, तो ऐसी स्थिति को नैतिक दुविधा (Moral Dilemma) कहा जाता है। बच्चों में नैतिकता का विकास लगभग चार वर्ष की आयु से प्रारंभ हो जाता है, जहाँ प्रारंभिक अवस्था में उनके नैतिक निर्णयों पर डर, भय और दंड का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।
कोह्लबर्ग ने अपने शोध में यह भी पाया कि नैतिक विकास के ये चरण सार्वभौमिक होते हैं, अर्थात् ये सभी समाजों में समान रूप से पाए जाते हैं। उनका मानना था कि बच्चे का नैतिक विकास विशिष्ट अनुभवों से शुरू होकर धीरे-धीरे सामान्य और व्यापक सिद्धांतों की ओर बढ़ता है। इसी आधार पर उन्होंने नैतिक चिंतन को तीन मुख्य स्तरों में विभाजित किया, जिनमें प्रत्येक स्तर के अंतर्गत दो-दो चरण शामिल किए गए।
Kohlberg Moral Development Theory-कोहलबर्ग का प्रयोग: ‘हाइन्ज़ की दुविधा’ (Heinz Dilemma)
कोहलबर्ग ने अपने शोध के लिए लोगों को कुछ कहानियाँ सुनाईं, जिनमें नैतिक दुविधाएँ थीं। सबसे प्रसिद्ध कहानी ‘हाइन्ज़’ की है, जिसकी पत्नी कैंसर से मर रही थी। एक दवा विक्रेता ने उस दवा की कीमत बहुत अधिक रखी थी। हाइन्ज़ के पास उतने पैसे नहीं थे, और अंत में उसने अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए दवा चुरा ली।
कोहलबर्ग ने लोगों से पूछा— क्या हाइन्ज़ को चोरी करनी चाहिए थी? क्यों या क्यों नहीं? उनके जवाबों के आधार पर कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के 3 स्तर और 6 अवस्थाएँ बताईं।
नैतिक विकास के 3 स्तर (3 Levels of Moral Development)

Kohlberg Moral Development Theory
1. पूर्व-परंपरागत स्तर (Pre-conventional Level) – (4 से 10 वर्ष)
पूर्व-परंपरागत स्तर (Pre-Conventional Level : 4–10 वर्ष)
4 से 10 वर्ष की आयु को सामान्यतः बाल्यावस्था (Childhood) कहा जाता है। कोह्लबर्ग के अनुसार यह नैतिक विकास का प्रारंभिक एवं सबसे निचला स्तर होता है। इस स्तर पर बच्चे के लिए सही और गलत का निर्धारण उसके अपने विवेक से नहीं, बल्कि बाहरी परिणामों जैसे दंड और पुरस्कार से प्रभावित होता है। अर्थात् नैतिकता पर बाह्य नियंत्रण रहता है।
इस अवस्था में बच्चा किसी व्यवहार को नैतिक या अनैतिक इस आधार पर मानता है कि उससे उसे सज़ा मिलेगी या लाभ होगा। जब बालक किसी कार्य का मूल्यांकन बाहरी भौतिक परिणामों के संदर्भ में करता है, तो उसकी नैतिक सोच को पूर्व-परंपरागत नैतिक तर्क कहा जाता है। इस स्तर को बंटनात्मक यथार्थवाद (Distributive Realism) का स्तर भी माना जाता है। कोह्लबर्ग ने अपने अध्ययन में इस स्तर के अंतर्गत 4 से 10 वर्ष तक के बच्चों को शामिल किया था।
इस स्तर के अंतर्गत नैतिक विकास की दो उप-अवस्थाएँ (Stages) होती हैं—
इस स्तर पर बच्चा सही और गलत का फैसला बाहरी परिणामों (सजा या इनाम) के आधार पर करता है।
- अवस्था 1: दंड और आज्ञाकारिता (Punishment & Obedience): बच्चा नियम इसलिए मानता है ताकि उसे सजा न मिले। (उदा: “चोरी नहीं करनी चाहिए क्योंकि पुलिस पकड़ लेगी।”)
- यह पूर्व-परंपरागत स्तर का प्रथम चरण है। इस अवस्था में बच्चे की नैतिक सोच पूरी तरह बाहरी सत्ता (माता-पिता, शिक्षक, बड़े लोग) पर निर्भर होती है। बच्चे किसी कार्य को सही या गलत इसलिए मानते हैं क्योंकि उससे दंड मिलने या न मिलने का प्रश्न जुड़ा होता है।इस चरण में बालक यह सोचता है कि बड़ों की आज्ञा का पालन करना आवश्यक है, क्योंकि अवज्ञा करने पर उसे सज़ा मिल सकती है। उसका व्यवहार पुरस्कार प्राप्त करने या दंड से बचने की भावना से प्रेरित होता है
- अवस्था 2: व्यक्तिगत विनिमय /स्वार्थ या अहंकार की अवस्था(Individualism & Exchange): इसे “जैसे को तैसा” भी कहते हैं। बच्चा सोचता है कि अगर मैं किसी की मदद करूँ, तो वो भी मेरी मदद करेगा।
- पूर्व-परंपरागत नैतिक विकास का दूसरा चरण है। इस अवस्था को साधन-सापेक्षता या यांत्रिक सापेक्षता (Instrumental Relativism) भी कहा जाता है। इस स्तर पर नैतिक सोच व्यक्ति-केंद्रित होती है, जहाँ बालक का मुख्य प्रश्न होता है—
- “इससे मुझे क्या लाभ मिलेगा?”
- इस अवस्था में बच्चे की नैतिक क्रियाएँ उसकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं, इच्छाओं और लाभ पर आधारित होती हैं। बालक उसी कार्य को सही मानता है जो उसके हित में हो। यहाँ नैतिकता का मापदंड दंड नहीं, बल्कि लाभ और सौदा (deal) बन जाता है।
- बालक यह मानने लगता है कि अपने फायदे के लिए कार्य करना गलत नहीं है, बशर्ते दूसरों को भी अपने फायदे के अनुसार कार्य करने का अवसर मिले। इस प्रकार इस स्तर की नैतिक सोच बराबरी के लेन-देन पर आधारित होती है—जहाँ निष्पक्षता का अर्थ आपसी लाभ से लगाया जाता है।
- उदाहरण (परिवर्तित):
- यदि कोई बच्चा अपने सहपाठी को गृहकार्य करने में मदद करता है, तो वह यह अपेक्षा करता है कि अगली बार सहपाठी उसकी कॉपी दिखा देगा या खेल के समय उसे पहले खेलने देगा। यहाँ सहायता नैतिक कर्तव्य से नहीं, बल्कि आपसी लाभ की उम्मीद से की जाती है।
- इस अवस्था में नैतिक सोच का सार यह होता है कि—
- “अगर मैं तुम्हारे काम आऊँगा, तो तुम भी मेरे काम आओगे।”
2. परंपरागत स्तर (Conventional Level) – (10 से 13 वर्ष)
लगभग 10 से 13 वर्ष की आयु को किशोरावस्था (Adolescence) की प्रारंभिक अवस्था माना जाता है। कोह्लबर्ग के अनुसार इस स्तर पर बच्चे नैतिक निर्णय व्यक्तिगत लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि समाज, परिवार और समूह की अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर लेने लगते हैं। इस अवस्था में नैतिकता पर सामाजिक नियंत्रण का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इस स्तर पर बच्चों का व्यवहार माता-पिता, शिक्षक और अन्य बड़ों द्वारा निर्धारित नियमों, परंपराओं और सामाजिक मान्यताओं पर आधारित होता है। कोह्लबर्ग ने अपने अध्ययन में इस स्तर के अंतर्गत उच्च प्राथमिक विद्यालय (Upper Primary) में पढ़ने वाले 10 से 13 वर्ष के बच्चों को शामिल किया था।
यह स्तर नियमों और सिद्धांतों पर आधारित नैतिक सोच को दर्शाता है, इसलिए इसे नैतिक यथार्थवाद (Moral Realism) का स्तर भी कहा जाता है। इस स्तर को भी दो उप-अवस्थाओं या चरणों में विभाजित किया गया है—
इस स्तर पर बच्चा समाज के नियमों और दूसरों की अपेक्षाओं को महत्व देने लगता है।
- अवस्था 3: अच्छे अंतर्वैयक्तिक संबंध (Good Boy/Nice Girl): बच्चा दूसरों की नज़रों में “अच्छा” बनने की कोशिश करता है। वह समाज की प्रशंसा पाना चाहता है।
- इस अवस्था में व्यक्ति का नैतिक व्यवहार दूसरों की अपेक्षाओं, विश्वास और स्वीकृति पर आधारित होता है। बच्चे और किशोर उन आचरणों को अपनाते हैं जिन्हें उनके माता-पिता, शिक्षक या समाज अच्छा मानते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य होता है—
- “लोग मेरे बारे में अच्छा सोचें।”
- इस चरण में बच्चे ईमानदारी, सहयोग, दूसरों की सहायता और निष्पक्षता को महत्व देने लगते हैं, क्योंकि इससे उन्हें प्रशंसा और सामाजिक स्वीकार्यता मिलती है। यहाँ नैतिकता का मानदंड यह होता है कि कौन-सा व्यवहार उन्हें “अच्छा लड़का” या “अच्छी लड़की” बनाता है।
- उदाहरण:
- कोई छात्र कक्षा में अनुशासित रहता है और समय पर गृहकार्य करता है, क्योंकि वह चाहता है कि शिक्षक और माता-पिता उससे प्रसन्न हों और उसकी सराहना करें।
- अवस्था 4: सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना (Law & Order): व्यक्ति यह मानने लगता है कि समाज को चलाने के लिए कानून और नियमों का पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य है।
- यह कोह्लबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत का चौथा चरण है। इस अवस्था में व्यक्ति यह समझने लगता है कि उसके व्यवहार का प्रभाव केवल उस पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए नैतिकता अब व्यक्तिगत या समूह की स्वीकृति तक सीमित न रहकर कानून, नियम, कर्तव्य और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ जाती है।
- इस चरण में किशोर सामाजिक नियमों का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि वे समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। उन्हें यह स्पष्ट होने लगता है कि कौन-सा व्यवहार समाज के हित में है और कौन-सा नहीं। न्याय, जिम्मेदारी और कर्तव्य की भावना का विकास इसी अवस्था में होता है।
- उदाहरण:
- किशोर यह मानते हैं कि भले ही कोई नियम व्यक्तिगत रूप से कठिन लगे, फिर भी उसे मानना चाहिए, क्योंकि नियमों का पालन करने से समाज सुव्यवस्थित और सुरक्षित रहता है।
3. उत्तर-परंपरागत स्तर (Post-conventional Level) – (13 वर्ष से ऊपर)
यह नैतिकता का सबसे ऊँचा स्तर है जहाँ व्यक्ति समाज के नियमों से ऊपर उठकर अपने विवेक (Conscience) से सोचता है।
13 वर्ष से अधिक आयु में, व्यक्ति युवा-प्रौढ़ अवस्था (Young Adulthood) में प्रवेश करता है। इस स्तर को आत्म-स्वीकृत नैतिक मूल्य स्तर (Self-Accepted Moral Values Level) भी कहा जाता है। यहाँ बच्चे या युवा नैतिक निर्णय केवल नियमों या समाज की अपेक्षाओं के आधार पर नहीं लेते, बल्कि अपने व्यक्तिगत सिद्धांतों और न्याय-बोध के आधार पर निर्णय करते हैं।
इस स्तर की विशेषता यह है कि नैतिकता पर आंतरिक नियंत्रण होता है। इसे सहयोगात्मक नैतिकता (Morality of Cooperation) भी कहा जाता है। कोह्लबर्ग ने इस स्तर को भी दो उप-चरणों में विभाजित किया है—
- अवस्था 5: सामाजिक अनुबंध (Social Contract): व्यक्ति समझता है कि नियम समाज की भलाई के लिए हैं, लेकिन अगर कोई नियम गलत है, तो उसे बदला जा सकता है।
- स अवस्था में व्यक्ति समाज के नियमों का पालन करता है, लेकिन अब यह अनिवार्य पालन नहीं बल्कि समझदारी और मूल्यांकन पर आधारित होता है। व्यक्ति यह सोचने लगता है कि कुछ नियम, अधिकार या सिद्धांत कानून से ऊपर भी हो सकते हैं।
- उसे यह समझ आता है कि समाज का सही संचालन केवल नियमों के पालन से नहीं, बल्कि न्याय, समानता और मूल अधिकारों की सुरक्षा के माध्यम से होता है। व्यक्ति समाज में मौजूद नियमों और कानूनों का मूल्यांकन करता है और अपने व्यवहार का निर्णय सामाजिक हित और नैतिक मूल्य को ध्यान में रखकर करता है।
- उदाहरण:
- एक किशोर यह मानता है कि स्कूल के कुछ नियम छात्रों की मूल स्वतंत्रता के खिलाफ हैं। इसलिए वह नियम तोड़ने से पहले शिक्षक से चर्चा करता है, ताकि सभी छात्रों के अधिकार सुरक्षित रहें।
- अवस्था 6: सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत (Universal Ethical Principles): यहाँ व्यक्ति अपने बनाए हुए उच्च सिद्धांतों (जैसे- मानवता, न्याय, समानता) पर चलता है, भले ही उसे इसके लिए कानून के खिलाफ ही क्यों न जाना पड़े। (जैसे- महात्मा गांधी या नेल्सन मंडेला)।
- यह कोह्लबर्ग का नैतिक विकास का उच्चतम स्तर है। इस चरण में व्यक्ति अपने अंतरात्मा, विवेक और सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है। निर्णय लेते समय वह केवल अपने या समाज के लाभ की बजाय सार्वभौमिक मानवाधिकार, न्याय और दूसरों के जीवन पर विचार करता है।
- यहाँ व्यक्ति अपने भावनाओं को नियंत्रित करके और मानसिक क्षमता का सही उपयोग करके उच्च नैतिक व्यवहार करता है। जब कोई निर्णय जोखिमपूर्ण या चुनौतीपूर्ण होता है, तब भी वह सत्य, न्याय और मानव अधिकार के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता रखता है।
- उदाहरण:
- कोई युवा डॉक्टर यह निर्णय लेता है कि आपातकालीन स्थिति में गरीब मरीज को मुफ्त इलाज देना चाहिए, भले ही इससे व्यक्तिगत लाभ कम हो। उसका निर्णय केवल नियमों पर नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नैतिकता और मानवता के सिद्धांतों पर आधारित है।
Kohlberg Moral Development Theory-कोहलबर्ग के सिद्धांत के मुख्य तथ्य (Quick Notes)
- आधार (Basis): कोहलबर्ग का सिद्धांत संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) पर आधारित है।
- नैतिक तर्कणा (Moral Reasoning): सही और गलत के प्रश्न के बारे में सोचने की प्रक्रिया।
- नैतिक दुविधा (Moral Dilemma): सही और गलत के बीच चयन करने में आने वाली कठिनाई।
- आलोचना (Criticism): कैरल गिलिगन (Carol Gilligan) ने कोहलबर्ग की आलोचना की थी। उनका तर्क था कि यह सिद्धांत ‘पुरुष प्रधान’ है और महिलाओं की नैतिकता (Care Ethics) को अनदेखा करता है।
Kohlberg Moral Development Theory-महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Practice MCQs)
प्रश्न 1: कोहलबर्ग के अनुसार, ‘अच्छे लड़के-अच्छी लड़की’ वाली अवस्था किस स्तर के अंतर्गत आती है? A) पूर्व-परंपरागत स्तर B) परंपरागत स्तर C) उत्तर-परंपरागत स्तर D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 2: ‘हाइन्ज़ की दुविधा’ का उपयोग किस मनोवैज्ञानिक ने अपने सिद्धांत में किया? A) जीन पियाजे B) लेव वायगोत्स्की C) लॉरेंस कोहलबर्ग D) बी.एफ. स्किनर
प्रश्न 3: नैतिकता की वह अवस्था जिसमें व्यक्ति समाज के नियमों की परवाह किए बिना अपने आंतरिक सिद्धांतों पर चलता है, क्या कहलाती है? A) अवस्था 2 (जैसे को तैसा) B) अवस्था 4 (कानून और व्यवस्था) C) अवस्था 6 (सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत) D) अवस्था 1 (दंड और आज्ञाकारिता)
उत्तर कुंजी (Answer Key)
- B) परंपरागत स्तर (इस स्तर पर बच्चा सामाजिक प्रशंसा चाहता है)।
- C) लॉरेंस कोहलबर्ग।
- C) अवस्था 6 (यह नैतिकता का उच्चतम स्तर है)।
निष्कर्ष
Kohlberg Moral Development Theory-कोहलबर्ग का सिद्धांत हमें सिखाता है कि नैतिकता सिर्फ नियमों को रटने का नाम नहीं है, बल्कि यह सोचने और तर्क करने की एक प्रक्रिया है जो उम्र के साथ विकसित होती है।
महत्वपूर्ण बात: कोहलबर्ग के अनुसार, हर व्यक्ति अंतिम स्तर (अवस्था 6) तक नहीं पहुँच पाता। अधिकांश लोग अवस्था 4 या 5 पर ही रुक जाते हैं।
🎯 बाल विकास: नैतिक विकास (Top 25 MCQs)
Kohlberg Moral Development Theory-कैरल गिलिगन की आलोचना और जीन पियाजे के सिद्धांत को समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि कोहलबर्ग का सिद्धांत इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है।
1. कैरल गिलिगन की आलोचना (Carol Gilligan’s Critique)
कैरल गिलिगन, कोहलबर्ग की ही शिष्या थीं, लेकिन उन्होंने कोहलबर्ग के सिद्धांत में एक बड़ी कमी बताई।
- लैंगिक पक्षपात (Gender Bias): गिलिगन का तर्क था कि कोहलबर्ग का शोध केवल पुरुषों और लड़कों पर आधारित था।
- देखभाल की नैतिकता (Ethics of Care): गिलिगन ने कहा कि पुरुष अक्सर “न्याय” (Justice) के आधार पर फैसला लेते हैं, जबकि महिलाएँ “जुड़ाव और देखभाल” (Care and Relationships) को प्राथमिकता देती हैं। कोहलबर्ग ने महिलाओं के इस दृष्टिकोण को निम्न स्तर का मान लिया था, जो कि गलत था।
2. जीन पियाजे का नैतिक विकास सिद्धांत (Piaget’s Theory of Moral Development)
कोहलबर्ग से पहले पियाजे ने नैतिकता पर काम किया था। उन्होंने मुख्य रूप से दो अवस्थाएँ बताई थीं:
- परतन्त्र नैतिकता (Heteronomous Morality) – [5 से 10 वर्ष]: यहाँ बच्चे मानते हैं कि नियम भगवान या बड़ों द्वारा बनाए गए हैं और उन्हें बदला नहीं जा सकता। अगर नियम टूटा, तो सजा निश्चित है।
- स्वायत्त नैतिकता (Autonomous Morality) – [10 वर्ष से ऊपर]: यहाँ बच्चा समझने लगता है कि नियम इंसानों ने बनाए हैं और आपसी सहमति से इन्हें बदला जा सकता है। यहाँ “इरादा” (Intention) मायने रखता है, सिर्फ परिणाम नहीं।
तुलनात्मक तालिका: पियाजे बनाम कोहलबर्ग -Kohlberg Moral Development Theory
| विशेषता | जीन पियाजे | लॉरेंस कोहलबर्ग |
| आधार | संज्ञानात्मक विकास (Cognitive) | संज्ञानात्मक विकास (Cognitive) |
| मुख्य फोकस | नियमों के प्रति बच्चों का नजरिया | नैतिक तर्कणा (Reasoning) |
| अवस्थाएँ | 2 मुख्य अवस्थाएँ | 3 स्तर और 6 अवस्थाएँ |
| स्त्रोत | खेल और अवलोकन | ‘हाइन्ज़’ जैसी काल्पनिक दुविधाएँ |
Kohlberg Moral Development Theory-आपकी तैयारी के लिए एक छोटा सा ‘Checklist’:
क्या आपको इन शब्दों का अर्थ स्पष्ट है?
- Moral Dilemma (नैतिक दुविधा): जब दो रास्तों में से एक चुनना मुश्किल हो।
- Moral Reasoning (नैतिक तर्कणा): दुविधा के समय सही/गलत सोचने का तर्क।
कोह्लबर्ग का नैतिक विकास – Levels, Stages & Examples
| स्तर / Level | चरण / Stage | मुख्य विशेषताएँ / Key Features | उदाहरण / Example |
|---|---|---|---|
| पूर्व-परंपरागत Pre-Conventional (4–10 वर्ष) |
चरण 1: आज्ञाकारिता एवं दंड / Order & Punishment | नैतिक निर्णय बाहरी सजा या पुरस्कार के आधार पर। बच्चों को डर से सही और गलत समझ आता है। | बच्चा नियम मानता है क्योंकि नहीं मानने पर दंड मिलेगा। |
| चरण 2: स्वार्थ / अहंकार / Stage of Ego | व्यक्तिगत हित और लेन-देन पर आधारित नैतिक सोच। बच्चा पूछता है “मेरे लिए क्या लाभ है?” | बच्चा किसी को मदद करता है क्योंकि उसे उम्मीद है कि बदले में उसे भी मदद मिलेगी। | |
| परंपरागत / Conventional (10–13 वर्ष) |
चरण 3: अच्छे पारस्परिक संबंध / Appreciation | नैतिकता दूसरों की प्रशंसा और स्वीकृति पर आधारित। बच्चे अच्छे व्यवहार को अपनाते हैं। | छात्र समय पर गृहकार्य करता है ताकि शिक्षक और माता-पिता प्रसन्न हों। |
| चरण 4: सामाजिक व्यवस्था का सम्मान / Respect for Social System | नैतिक निर्णय नियम, कानून और सामाजिक कर्तव्यों के आधार पर। समाज और न्याय का ध्यान रखा जाता है। | किशोर नियम तोड़ने से पहले सोचता है कि क्या इससे समाज का नुकसान होगा। | |
| उत्तर-परंपरागत / Post-Conventional (13+ वर्ष) |
चरण 5: सामाजिक समझौते / Social Contract | व्यक्तिगत निर्णय और सामाजिक नियमों का संतुलन। कुछ मूल्य और अधिकार कानून से ऊपर हो सकते हैं। | किशोर सोचता है कि कुछ स्कूल के नियम छात्रों के मूल अधिकारों के खिलाफ हैं, इसलिए चर्चा करता है। |
| चरण 6: सार्वभौमिक सिद्धांत / Conscience / Universal Principles | नैतिकता के निर्णय सार्वभौमिक सिद्धांत, न्याय और मानव अधिकारों पर आधारित। आंतरिक विवेक मुख्य। | युवा डॉक्टर गरीब मरीज को मुफ्त इलाज देता है, केवल नियम पालन के लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए। |
🎯 कोहलबर्ग 25 फ्लैशकार्ड्स
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कोह्लबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत — SAMRPAN
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